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ⓘ भू-आकृति विज्ञान




                                               

अनाच्छादन

अनाच्छादन भूपटल पर परिवर्तन लाने वाली कई प्रक्रियाओं का समूह है जिसके अंतर्गत अत्यंत मंथर गति से पृथ्वी की ऊपरी सतह कि चट्टानों का कटाव और क्षरण होता रहता है और भूपटल समतलता की ओर प्रवृत होता है।अनाच्छादन के प्रक्रमों को दो प्रमुख वर्गों में बाँटा जाता है, अपक्षय एवं अपरदन।

                                               

अपक्षय

अपक्षय वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पृथ्वी की सतह पर मौजूद चट्टानें में टूट-फूट होती है। यह अपरदन से अलग है, क्योंकि इसमें टूटने से निर्मित भूपदार्थों का एक जगह से दूसरी जगह स्थानान्तरण या परिवहन नहीं होता। यह अवघटना इन सितु होती है, इसके बाद निर्मित पदार्थों का कुछ हिस्सा अवश्य अपरदन के कारकों द्वारा परिवहन हेतु उपलब्ध हो जाता है। आमतौपर इसे एक जटिल प्रक्रिया माना जाता है जिसमें वातावरण का तापमान, नमी, चट्टान की संरचना, दाब और विविध रासायनिक और जैविक कारक एक साथ मिलकर कार्य करते हैं। चट्टानों के टूटने के कारण के आधापर अपक्षय के तीन प्रकार बताये जाते हैं: भौतिक, रासायनिक और जैविक अपक्षय।

                                               

अपरदन

अपरदन वह प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें चट्टानों का विखंडन और परिणामस्वरूप निकले ढीले पदार्थों का जल, पवन, इत्यादि प्रक्रमों द्वारा स्थानांतरण होता है। अपरदन के प्रक्रमों में वायु, जल तथा हिमनद और सागरीय लहरें प्रमुख हैं।

                                               

अपरदन-चक्र

समुद्रतल के ऊपर उठने के उपरांत धरातल के किसी भाग पर होने वाली भूम्याकृतियों के क्रमिक परिवर्तन को ही अपरदन-चक्र य क्षयचक्र या अपक्षयचक्र अथवा भूम्याकृतिचक्र कहते हैं।

                                               

अवकूट

अवकूट या लैपीज़ का निर्माण तब होता हैं जब कार्स्ट क्षेत्रों में जल के द्वारा घुलन क्रिया के कारण ऊपरी बाह्य सतह अत्यधिक ऊबड-खाबड एवं पतली शिखरिकाओं तथा संकरे गड्ढ़ों वाली हो जाती हैं। इनका निर्माण हो जाने के बाद चूना पत्थर की सतह इतनी असमान और नुकीली हो जाती हैं कि उस पर बिना जूतों के चलना बडा कठिन हो जाता हैं। इंग्लैण्ड में इसे क्लिंट तथा जर्मनी में कैरेल कहा जाता हैं।

                                               

आश्चुताश्म

कन्दरा की छत से रिसता हुवा जल धीरे-धीरे टपकता रहता हैं। इस जल में अनेक पदार्थ घुले रहते हैं। अधिक ताप के कारण वाष्पीकरण होने पर जल सूखने लगता हैं तथा कन्दरा की छत पर पदार्थों का निक्षेप होने लगता हैं। इस निक्षेप की आक्र्ति परले स्तंभ की तरह होती हैं जो छत से नीचे फर्श की ओर विकसित होते हैं।

                                               

उपनदी

उपनदी या सहायक नदी ऐसे झरने या नदी को बोलते हैं जो जाकर किसी मुख्य नदी में विलय हो जाती है। उपनदियाँ सीधी किसी सागर या झील में जाकर नहीं मिलतीं। कोई भी मुख्य नदी और उसकी उपनदियाँ एक जलसम्भर क्षेत्र बनती हैं जहाँ का पानी उपनदियों के ज़रिये मुख्य नदी में एकत्रित होकर फिर सागर में विलय हो जाता है। इसका एक उदाहरण यमुना नदी है, जो गंगा नदी की एक उपनदी है। प्रयाग में विलय के बाद यमुना का पानी गंगा में मिल जाता है और उस से आगे सिर्फ मुख्य गंगा नदी ही चलती है।

                                               

कार्स्ट

कार्स्ट स्थलाकृतियाँ सामान्यतः घुलनशील चट्टानों वाले क्षेत्रों में जल की क्रिया द्वारा बनी स्थलाकृतियाँ हैं। इनका नामकरण यूगोस्लाविया के कार्स्ट प्रदेश के आधापर हुआ है जहाँ ये स्थलरूप बहुतायत से पाए जाते हैं। भारत में ऐसी स्थलाकृतियाँ रीवाँ के पठार, राँची पठाऔर चित्रकूट के पास पायी जाती हैं। गुप्तधाम कन्दरा एक ऐसी ही गुफा है जो कार्स्ट प्रक्रमों द्वारा निर्मित है। भारत में कार्स्ट स्थलाकृति का प्रभाव बस्तियों के बनने और उनके प्रतिरूप पर भी पड़ा है जैसे चूना पत्थर के क्षेत्रों में जल की क्रिया के कारण कार्स्ट स्थलाकृतियों का निर्माण होता है। कार्स्ट स्थलरूपों में कुछ प्रमुख हैं:

                                               

जलप्रपात

जल प्रपात अथवा झरना एक प्रमुख प्रवाही जल कृत अपरदनात्मक स्थलरुप हैं और जलस्रोत हैं। प्राकृतिक झरने कई नदियों के उद्गम हैं। भारत का सबसे ऊंचा जलप्रपात = महात्मा गांधी जलप्रपात उंचाई =293 मीटर अन्य नाम = जोग,गरसोपा नदी = शबरती नदी कर्नाटक

                                               

निश्चुताश्म

कन्दरा की छत से टपकता हुआ जल फर्श पर धीरे-धीरे एकत्रित होता रहता है। इससे फर्श पर भी स्तंभ जैसी आकृति बनने लगती है। यह विकसित होकर छत की ओर बढ़ने लगती हैं।

                                               

पुराचुम्बकत्व

पराचुम्बकत्व से भ्रमित न हों। पुराचुम्बकत्व अध्ययन की वह शाखा है जो चट्टानों, अवसादों या अन्य ऐसी चीजों में उनके निर्माण के समय संरक्षित चुम्बकीय गुणों का अध्ययन करती है। इस प्रकार विज्ञान की यह शाखा प्राचीन भूवैज्ञानिक घटनाओं के अध्ययन में सहायक होती है।समुद्री क्रस्ट की चट्टानों के पुराचुम्बकत्व के अध्ययन से इनके निर्माण के समय का पता चलता है और सागर नितल प्रसरण की पुष्टि हुई थी तथा प्लेट विवर्तनिकी का सिद्धान्त मजबूती से स्थापित हुआ चित्र देखें।

                                               

पोज़ोलाना

पोज़ोलाना या पोज़ोलाना की राख, एक महीन, रेतीली ज्वालामुखीय राख है। पोज़ोलाना को पहली बार इटली के पोज़्ज़ुओली में वेसुवियस ज्वालामुखी के आसपास के क्षेत्र में खोजा और खोदा गया था। इसके बाद इसे अन्य कई स्थानों पर भी पाया गया। वित्रुवियस के अनुसार पोज़ोलाना के चार प्रकार क्रमश: काला, सफेद, धूसर और लाल, इटली के ज्वालामुखीय क्षेत्रों जैसे कि नेपल्स में पाये जाते हैं।

                                               

बाढ़ बेसाल्ट

बाढ़ बेसाल्ट ऐसे भयानक ज्वालामुखीय विस्फोट या विस्फोटों की शृंखला का नतीजा होता है जो किसी समुद्री फ़र्श या घरती के विस्तृत क्षेत्पर बेसाल्ट लावा फैला दे, यानि वहाँ लावा की बाढ़ फैलाकर उसे जमने पर बेसाल्ट की चट्टानों से ढक दे। बहुत ही बड़े बाढ़ बेसाल्ट के प्रदेशों को उद्भेदन कहा जाता है, जिसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण भारत का दक्कन उद्भेदन है। पृथ्वी के पिछले २५ करोड़ वर्षों के इतिहास में बाढ़ बेसाल्ट की ग्यारह घटनाएँ रहीं हैं, जिन्होंने विश्व में कई पठाऔर पर्वतमालाएँ निर्मित की हैं। हमारे ग्रह के इतिहास की पाँच महाविलुप्ति घटनाओं के पीछे भी एसी बाढ़ बेसाल्ट घटनाओं के होने का सन्देह है और सम्भ ...

                                               

भू-संतुलन

भू-संतुलन या समस्थिति का अर्थ है पृथ्वी की भूपर्पटी के सतही उच्चावच के रूप में स्थित पर्वतों, पठारों और समुद्रों के उनके भार के अनुसार भूपर्पटी के नीचे स्थित पिघली चट्टानों के ऊपर संतुलन बनाए रखने की अवस्था। पृथ्वी का स्थलमण्डल अपने नीचे स्थित एस्थेनोस्फियर पर एक प्रकार से तैरता हुआ स्थित है और संतुलन के लिए यह आवश्यक माना जाता है कि जहाँ धरातल पर ऊँचे पर्वत या पठार हैं वहाँ स्थलमण्डल की मोटाई अधिक है और इसका निचला हिस्सा पर्वतों की जड़ों की तरह एस्थेनोस्फियर में अधिक गहराई तक घुसा हुआ है। पर्वतों के नीचे स्थलमण्डल के इस नीचे एस्थेनोस्फियर में प्रविष्ट भाग अथवा समुद्रों के नीचे कम गहराई तक ...

                                               

भूपर्पटी

भूपर्पटी या क्रस्ट भूविज्ञान में किसी पथरीले ग्रह या प्राकृतिक उपग्रह की सबसे ऊपर की ठोस परत को कहते हैं। यह जिस सामग्री का बना होता है वह इसके नीचे की भूप्रावार कहलाई जाने वाली परत से रसायनिक तौपर भिन्न होती है। हमारे सौरमंडल में पृथ्वी, शुक्र, बुध, मंगल, चन्द्रमा, आयो और कुछ अन्य खगोलीय पिण्डों के भूपटल ज़्यादातर ज्वालामुखीय प्रक्रियाओं में बने हैं । अन्तरिक्ष से देखने पर पृथ्वी लगभग गोलाकार गेंद की भाँति दिखाई देती है। इस गोलाकार पृथ्वी की पर्पटी की संतरे के छिलके से तुलना की जा सकती है। मोटाई के आधापर यह सबसे पतली परत है और इसकी औसत मोटाई लगभग ३३ कि॰ मी॰ मानी जाती है। भूपर्पटी हल्की चट ...

                                               

भूसन्नति

भूसन्नति भूविज्ञान तथा भूआकृतिविज्ञान की एक अपेक्षाकृत पुरानी संकल्पना और शब्द है जिसका व्यवहार अभी भी कभी-कभी ऐसे छिछले सागरों अथवा सागरीय द्रोणियों के लिए किया जाता है जिनमें अवसाद जमा होने और तली के धँसाव की प्रक्रिया चल रही हो। सर्वप्रथम इस तरह का विचार अमेरिकी भूवैज्ञानिक जेम्स हाल और जेम्स डी डाना द्वारा प्रस्तुत किया गया था और इसके द्वारा पर्वतों की उत्पत्ति की व्याख्या करने वाले सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया था। हालाँकि, प्लेट टेक्टॉनिक्स सिद्धांत के बाद यह परिकल्पना अब पुरानी पड़ चुकी है। हाल और डाना ने भूसन्नतियों की परिकल्पना एप्लेशियन पर्वत की उत्पत्ति की व्याख्या प्रस्तुत करन ...

                                               

मिश्रित ज्वालामुखी

मिश्रित ज्वालामुखी, एक लंबा, शंक्वाकार ज्वालामुखी होता है, जिसका निर्माण जम कर ठोस हुए लावा, टेफ्रा, कुस्रन और ज्वालामुखीय राख की कई परतों द्वारा होता है। मिश्रित ज्वालामुखी को ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि, इनकी रचना ज्वालामुखीय उद्गार के समय निकले मिश्रित पदार्थों के विभिन्न स्तरों पर घनीभूत होने के फलस्वरूप होती है। ढाल ज्वालामुखी के विपरीत, तीखी ढलान और समय पर होने वाले विस्फोटक उद्गार इनकी विशेषतायें है। इन ज्वालामुखियों से निकला लावा, ढाल ज्वालामुखी से निकले लावे की तुलना में अधिक श्यान होता है और आमतौपर उद्गार के पश्चात दूर तक बहने से पहले ही ठंडा हो जाता है। इनके लावे की रचना करने ...

                                               

रिफ़्ट घाटी

रिफ़्ट घाटी एक स्थलरूप है जिसका निर्माण विवर्तनिक हलचल के परिणामस्वरूप होने वाले भ्रंशन के कारण होता है। ये सामान्यतया पर्वत श्रेणियों अथवा उच्चभूमियों के बीच स्थित लम्बी आकृति वाली घाटियाँ होती हैं जिनमें अक्सर झीलें भी निर्मित हो जाती है।

                                               

लावा

लावा पिघली हुई चट्टान आर्थात मैग्मा का धरातल पर प्रकट होकर बहने वाला भाग है। यह ज्वालामुखी उद्गार द्वारा बाहर निकलता है और आग्नेय चट्टानों की रचना करता है। ज्वालामुखी से निकले लावा से बेसाल्ट चट्टानो का निर्माण हुआ, जिनके निक्षादन से र्पायदिपिय पठार का निर्माण हुआ है।

                                               

वलित पर्वत

वलित पर्वत वे पर्वत हैं जिनका निर्माण वलन नामक भूगर्भिक प्रक्रिया के तहत हुआ है। प्लेट विवर्तनिकी के सिद्धांत के बाद इनके निर्माण के बारे में यह माना जाता है कि भूसन्नतियों में जमा अवसादों के दो प्लेटों के आपस में करीब आने के कारण दब कर सिकुड़ने और सिलवटों के रूप में उठने से हुआ है। टर्शियरी युग में बने वलित पर्वत आज सबसे महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखलाओं में से हैं जैसे ऐल्प्स, हिमालय, इत्यादि। विश्व के नविनतम पर्वत हिमालय, युराल, एन्डिज

                                               

शैल

पृथ्वी की ऊपरी परत या भू-पटल में मिलने वाले पदार्थ चाहे वे ग्रेनाइट तथा बालुका पत्थर की भांति कठोर प्रकृति के हो या चाक या रेत की भांति कोमल; चाक एवं लाइमस्टोन की भांति प्रवेश्य हों या स्लेट की भांति अप्रवेश्य हों, चट्टान अथवा शैल कहे जाते हैं। इनकी रचना विभिन्न प्रकार के खनिजों का सम्मिश्रण हैं। चट्टान कई बार केवल एक ही खनिज द्वारा निर्मित होती है, किन्तु सामान्यतः यह दो या अधिक खनिजों का योग होती हैं। पृथ्वी की पपड़ी या भू-पृष्ठ का निर्माण लगभग २,००० खनिजों से हुआ है, परन्तु मुख्य रूप से केवल २० खनिज ही भू-पटल निर्माण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। भू-पटल की संरचना में ऑक्सीजन ४६.६%, सिलिक ...

                                               

स्थलाकृति

स्थलाकृति ग्रहविज्ञान की एक शाखा है जिसमें पृथ्वी या किसी अन्य ग्रह, उपग्रह या क्षुद्रग्रह की सतह के आकार व आकृतियों का अध्ययन किया जाता है। नक़्शों के निर्माण में स्थलाकृति का विशेष महत्व है।

                                               

हेलिक्टाइट

ये भी स्तंभ जैसी आक्र्ति हैं किन्तु इनका निर्माण जल की बूंदो द्वारा नही बल्कि आर्द्रतायुक्त सतह पर होता हैं। इसके निर्माण मे गुरुत्व का प्रभाव नही होता। इसका विकास किसी भी मे सम्भव हैं।

                                               

हॉगबैक

अपरदन के बाद निर्मित अवरोधी शैलों वाली लम्बी, पतली तथा खड़े ढाल वाली श्रेणियों को हाॅगबैक या शूकर कटक कहते हैं। इसका नति तथा ढाल दोनो खड़े होते हैं जबकि क्वेस्टा का नति तथा ढाल झुका होता है।

                                     

ⓘ भू-आकृति विज्ञान

  • पद र थ व ज ञ न एक बह व षयक क ष त र ह ज सम पद र थ क व भ न न ग ण क अध ययन, व ज ञ न एव तकन क क व भ न न क ष त र म इसक प रय ग क अध ययन क य
  • अथव भ त क प रक त व ज ञ न क एक व श ल श ख ह भ त क क पर भ ष त करन कठ न ह क छ व द व न क मत न स र यह ऊर ज व षयक व ज ञ न ह और इसम ऊर ज क
  • खन ज व ज ञ न अ ग र ज म नरल ज भ व ज ञ न क एक श ख ह त ह इसम खन ज क भ त क और र स यन क ग ण क अध ययन क य ज त ह व ज ञ न क इस श ख क अ तर गत
  • र पबद ध व ज ञ न ज स औपच र क व ज ञ न भ कह ज त ह औपच र क न क य क अध ययन ह ज स तर कश स त र, गण त, स ख य क स द ध त क स गणक व ज ञ न स चन स द ध त
  • व स त त ल ख सर व क षण क आध रभ त स द ध न त द ख ठ क भ ग ल क स थ त म भ आक त क र प कन क ल य म नच त र क क ष त र क अ दर ऐस प रम ख न य त रण ब द ओ
  • प ल म स म न ज त ह और ऐस स थल क ह टस प ट क स ज ञ द ज त ह भ - आक त व ज ञ न म ज व ल म ख क आकस म क घटन क र प म द ख ज त ह और प थ व क
  • एक प र य ग क व ज ञ न ह ज सम ठ स म परम ण क व न य स arrangement क अध ययन क य ज त ह पहल क र स टल क स त त पर य उस व ज ञ न स थ ज सम
  • ह स क ष मज व क अत व श ल शब द ह ज सम व ष ण व ज ञ न कवक व ज ञ न परज व व ज ञ न ज व ण व ज ञ न व कई अन य श ख ए आत ह स क ष मज व क म तत पर
  • भ - स त लन य समस थ त lsostasy क अर थ ह प थ व क भ पर पट क सतह उच च वच क र प म स थ त पर वत पठ र और सम द र क उनक भ र क अन स र भ पर पट
  • भ रत य व ज ञ न क पर पर व श व क प र च नतम व ज ञ न क पर पर ओ म एक ह भ रत म व ज ञ न क उद भव ईस स 3000 वर ष प र व ह आ ह हड प प तथ म हनज दड
उघड़ना (भूविज्ञान)
                                               

उघड़ना (भूविज्ञान)

यह बहुत कम है पर है| जहाँ मेटा अपरदन अधिक सामग्री है, वहां पर जमीन के अंदर की बातें बाहर आ रही है | यह टेक्टोनिक प्लेटो की टकर के कारण भी है

                                               

चूर्णकूट

नीबू में राज्य के अधिकांश शैले अपनी झूठ द्वारा नष्ट कर दिया, केवल कुछ बिक्री के टीले कटाव अप्रभावित रह जाते हैं और अवशिष्ट पहाड़ों या टिब्बा के रूप में दिखाई देते हैं. हम थे यूगोस्लाविया, हास्य फ्रांस, लेकिन कहते हैं ।

                                               

परिहिमानी प्रक्रम

प्राथमिक प्रक्रिया की परत पर वे परिवर्तन के कारकों या प्रक्रियाओं कर रहे हैं, जो के प्रभाव ग्लेशियरों के आसपास शिक्षण होता है कि जहां वर्ष के कुछ निश्चित समय भूमि बर्फ से ढके और बाकी के समय में मानव पिघल झोपड़ी में ले जाया गया.

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